Wednesday, April 21, 2010

'माउन्ट एनालॉग' यानी जब आप कुछ बनने की कोशिश करते हैं, आप जीना शुरू कर देते हैं


आज बस एक रीपोस्ट

रेने दॉमाल (१९०८-१९४४) की किताब 'माउन्ट एनालॉग' का उपशीर्षक बेहद दिलचस्प लगा था: 'अ नॉवेल ऑफ़ सिम्बॉलिकली ऑथेन्टिक नॉन-यूक्लीडियन एडवेन्चर्स इन माउन्टेन क्लाइम्बिंग'। पर्वतारोहण में स्वयं मेरी काफ़ी दिलचस्पी रही है और शुक्र है उम्र के बीतते जाने के बावजूद बची हुई है। मेरे मित्र थे श्री दुर्गा चरण काला। मित्र क्या थे, गुरु थे। जीवन का लम्बा समय पत्रकारिता में गुज़ारने के बाद उन्होंने अपना आखि़री समय रानीखेत में गुज़ारा। 'जिम कॉर्बेट ऑफ़ कुमाऊं' और 'हुल्सन साहिब' (हरसिल एस्टेट के विख्यात फ़्रैडरिक विल्सन की पहली आधिकारिक जीवनी) जैसी ऐतिहासिक महत्व की किताबें लिख चुके काला जी (जिन्हें हम लोग काला मामू कहा करते थे) पिछले साल नहीं रहे। ख़ैर। सड़्सठ साल की आयु में रूपकुंड जैसा भीषण मुश्किल ट्रैक कर चुकने वाले काला मामू की लाइब्रेरी में रखी 'माउन्ट एनालॉग' उनकी सबसे प्रिय किताबों में थी। वहीं से मैं इस किताब की फ़ोटोकॉपी करा के लाया था। सो किताब का हर पन्ना पढ़ते हुए उनकी और उनके साथ बिताए समय की याद आना लाज़िमी था। काला मामू पर विस्तार से कभी लिखूंगा।



फ़्रांसीसी मूल के कवि, लेखक और चिंतक रेने दॉमाल की शुरुआती कविताओं को आन्द्रे ब्रेतों और दादा ने प्रकाशित किया। गुर्जेफ़ जैसे महान दार्शनिक के अनुयायी रेने दॉमाल ने स्वयं संस्कृत सीखी और कुछेक किताबों का संस्कृत से फ़्रैंच में तर्ज़ुमा भी किया। कुल ३६ साल की उम्र में चल बसे दॉमाल को बीसवीं सदी के सबसे प्रतिभाशाली लेखकों में गिना जाता था।

'माउन्ट एनालॉग' एक काल्पनिक पर्वत के आरोहण का वर्णन है। यह एक ऐसा पहाड़ है जिसे देखा नहीं बल्कि समझा जाना होता है। उसे एक विशेष स्थान से ही देखा/समझा जा सकता है जहां सूर्य की किरणें धरती पर एक ख़ास कोण पर पड़ती हैं। 'माउन्ट एनालॉग' एक अधूरी रचना है और अपने मरने के दिन तक दॉमाल इस पर काम कर रहे थे।

इस छोटी सी किताब ने मुझे कई बार उद्वेलित किया है। कल रात मैंने इसे संभवत: पांचवीं बार ख़त्म किया तो सोचा इस का ज़िक्र ज़रूर किया जाना चाहिए। किताब में उदधृत दॉमाल की एक कविता का अनुवाद ख़ासतौर पर कबाड़ख़ाने के पाठकों के लिए:

मैं मृत हूं क्योंकि मेरी कोई इच्छा नहीं है
मेरी कोई इच्छा नहीं है क्योंकि मुझे लगता है कि मेरे पास सब कुछ है
मैं समझता हूं कि मेरे पास सब कुछ है क्योंकि मैं देने की कोशिश नहीं करता।

जब आप देने की कोशिश करते हैं तो आप को पता चलता है
कि आप के पास कुछ भी नहीं हैं;

जब आप को पता चलता है कि आप के पास कुछ भी नहीं है
तो आप ख़ुद को दे देने की कोशिश करते हैं;

जब आप ख़ुद को दे देने की कोशिश करते हैं
तो आप देखते हैं कि आप कुछ नहीं हैं;

जब आप देखते हैं कि आप कुछ नहीं हैं
तो आप कुछ बनने की कोशिश करते हैं;

जब आप कुछ बनने की कोशिश करते हैं
आप जीना शुरू कर देते हैं।


('माउन्ट एनालॉग' को पैंग्विन प्रकाशन ने छापा है)

7 comments:

सागर said...

सर जी और ...
हमें ऐसी कविताओं से बड़ा बल मिलता है...,

डॉ .अनुराग said...

hummm......dilchasp hai.

Asha Joglekar said...

जब आप कुछ बनने की कोशिश करते हैं
आप जीना शुरू कर देते हैं।
वाह !

Mayur Malhar said...

जब आप कुछ बनने की कोशिश करते हैं
आप जीना शुरू कर देते हैं।



वाकई दिलचस्प बहुत दिलचस्प
इतनी बढ़िया पोस्ट के लिए शुक्रिया.

siddheshwar singh said...

बढ़िया साहब ! विस्तार से लिखे का इंतजार ! !

abcd said...

कैसे लोग जीवन मे टक्रराते है/कैसी जान्कारिया आप्से टक्र्राती है..ये भी योग की बात होती है..ऐसा सुना है/

कैसे blogs पे आप पहुच्ते है ...अब तो ये योग की बात लग्ने लगी है..:-)

इस कविता को पुरा सम्झने के लिये जीवन का---घटनाओ से भरपूर----होने की दरकार है /

एक छोटा मुह बडी बात करने की कोशिश......

कविता को पड्कर ये खयाल आया की पहली लाइन--म्रित्यु--से शुरु है,और अन्त हुआ इस्का --जीने---से !!

तो मैने इसे उल्टा कर के पडा कारन ये था की प्रक्रिति तो --जीवन से म्रित्यु है----

तो लौटते हुए मैने"तो"हटा दिये और"जब"की जगह"अब"कर दिया/

अजब मज़ा आया भाइ साहब....

abcd said...

भिया...एक बात कहना भूल गया...फ़ोटू शानदाsssssssssssssर है...