Saturday, August 26, 2017

शिक्षा आज भी दिमाग में ठूंसने जैसी ही चीज़ है


शिक्षा का संक्षिप्त इतिहास
स्कूलों के बारे में समझ बनाने के लिए जरूरी है उनकी ऐतिहासिक पड़ताल

- पीटर ग्रे

(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

आज जब हम देखते हैं कि हर जगह बच्चों को स्कूल भेजना कानूनी बाध्यता है, लगभग सभी स्कूल एक ही ढर्रे पर चलाये जाते हैं, और ऐसे स्कूलों को स्थापित करने में हमारा समाज अच्छी खासी मशक्कत और खर्चा करता है, तो हमारा यह सोचना स्वाभाविक है कि इस सब के पीछे कोई नेक और वाजिब वजह जरूर रही होगी. शायद, अगर हम बच्चों को जबरन स्कूल न भेजें, या फिर स्कूल उस तरह काम न करें जैसे वे करते हैं, तो बच्चे समर्थ वयस्क नहीं बन पाएंगे. शायद कुछ बेहद बुद्धिमान लोगों ने यह तरकीब खोज निकली होगी और उसे सही सिद्ध कर दिखाया होगा. या फिर बच्चों के विकास व शिक्षा के वैकल्पिक तौर-तरीके व्यावहारिक परीक्षणों में गलत साबित हो गए होंगे.

अपने पिछले आलेखों में मैंने इसके विपरीत प्रमाण प्रस्तुत किये थे. ख़ास तौर पर तेरह अगस्त वाले आलेख में मैंने सडबरी स्कूल का जिक्र किया था. इस स्कूल में बच्चे पिछले 40 वर्षों से परंपरागत स्कूलों के एकदम विपरीत तौर तरीकों और व्यवस्था के बीच खुद को शिक्षित करते हैं.  इस स्कूल और इससे निकले हुए विद्यार्थियों का अध्ययन बताता है कि औसत बच्चे अपने खेलों तथा खोजों से बड़ों के दिशा-निर्देशों और टोका-टोकी के बगैर शिक्षित हो जाते हैं. और एक बड़े सांस्कृतिक परिवेश के भीतर सम्पूर्ण व प्रभावी वयस्क के रूप में खुद को स्थापित करते हैं. दिशा-निर्देश व टोका-टोकी की जगह स्कूल बच्चे को एक समृद्ध वातावरण मुहैया कराता है जिसमें, खेलना, खोजना और लोकतंत्र का स्वाद जैसे तत्वों की भरमार है. मजेदार बात है कि यह सब परंपरागत स्कूल की तुलना में बहुत कम खर्चे और सबको साथ लेकर किया जाता है.

अगर हम ये जानना चाहते हैं की आज के औसत स्कूल ऐसे क्यों हैं, तो हमें इस समझ से न=बाहर निकलना होगा की वे एक तार्किक जरूरत व वैज्ञानिक सोच का परिणाम हैं, बल्कि वे इतिहास की दें हैं. वर्तमान स्कूली शिक्षा प्रणाली का तभी कोई औचित्य समझ में आता है, जब हम इसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष में देखते हैं. इसलिए वर्तमान स्कूलों की आलोचना करने से पहले मैं यहाँ संक्षेप में शिक्षा के इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत करना चाहता हूँ- मानव जाति के आरम्भ से आज तक. शैक्षिक इतिहास के अधिकाँश विद्वान अपनी बातों को अलग शब्दावली में पेश करते हैं. लेकिन मैं समझता हूँ कि मेरी रूपरेखा से वे काफी हद तक सहमत होंगे.सच कहूं तो इस रूपरेखा को तैयार करने में मैंने इन विद्वानों के लेखों का पर्याप्त उपयोग किया है.

शुरुआत में, सैकड़ों हजारों वर्षों तक, बच्चे स्व-निर्देशित खेलों तथा खोज विधियों से खुद को प्रशिक्षित करते रहे.

मनुष्य प्रजाति के जैविक इतिहास की तुलना में स्कूल एकदम नई संस्थाएं हैं. सैकड़ों हजार वर्षों  तक खेती के प्रारंभ से पूर्व, हमारे पूर्वज शिकारी संग्राहक थे. अपने पिछले आलेखों में मैंने मानवशास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया था कि घुमंतू संस्कृतियों के बच्चे किस तरह उन चीजों को अपने खेलों और खोजों के जरिये स्वयं सीख लेते थे, एक समर्थ वयस्क बनने के लिए  जिन्हें सीख जाना आवश्यक था. बच्चों में खेलने और खोजने की जबरदस्त इच्छा संभवतः घुमंतू समाज के रूप में हमारे विकास की देन है, जो तात्कालिक समाज में शिक्षा की जरूरतों को पूरा करती थी. शिकारी संग्राहक समाजों के वयस्क अपने बच्चों को खेलना और अपने आस पास को स्वयं खोजने की बेरोकटोक आजादी देते थे. वे जानते थे कि बच्चों की सहज शिक्षा के लिए ये गतिविधियाँ जरूरी हैं.

खेती और बाद में उद्योगों  के आगमन के बाद, बच्चे बलात् मजदूर बन गए. खेलने और खोजने  की आजादी उनसे छीन ली गयी. मनमर्जी, जो कभी एक गुण मानी जाती थी, अब बुराई में गिनी जाने लगी, जिसका इलाज सिर्फ पिटाई था.

आज से लगभग 10 हजार वर्ष  पहले दुनिया के कुछ हिस्सों में खेती की शुरुआत हुई और फिर यह बाकी जगह भी पहुंची. खेती ने लोगों की जीवन शैली में अमूल-चूल परिवर्तन ला दिए. शिकारी संग्राहक जीवन शैली, कौशल एवं ज्ञान केन्द्रित थी, श्रम केन्द्रित नहीं. एक प्रभावी शिकारी संग्राहक बनने के लिए लोगों को उन वनस्पतियों व जीव-जंतुओं के बारे में पर्याप्त ज्ञान हासिल करने की जरूरत पड़ती थी, जिन पर वे निर्भर थे. इसके अलावा उनको अपने आवास क्षेत्र की बारीकियों को भी जानना पड़ता था. शिकार व भोजन संग्रह के लिए उन्हें औजारों को बनाने और इस्तेमाल करने के हुनर में भी महारत हासिल करनी पड़ती थी. भोजन खोजने और उनका पीछा करने की कला तथा इसके लिए पहल करने में भी क्षमतावान बनना जरूरी था. बेशक उन्हें घंटों तक काम करने, खटने की जरूरत नहीं पड़ती थी, और उनके काम बेहद रोमांचक होते थे, उबाऊ नहीं. मानवशास्त्री बताते हैं कि शिकारी संग्राहक समूह काम और खेल के बीच फर्क नहीं समझते थे. दरअसल उनका पूरा जीवन एक खेल की तरह था.

खेती ने जीवन की पूरी तस्वीर बदल डाली. खेती की मदद से लोग ज्यादा भोजन पैदा करने लगे, जिससे ज्यादा ज्यादा बच्चे पैदा करने की छूट मिल गयी. खेती ने लोगों का स्थाई बस्तियों में रहना संभव बनाया (या रहने को मजबूर किया).  अब वे इधर उधर घूमने की बजाय अपनी खेती के आस पास रहने लगे. इससे प्रकारांतर में, संपत्ति की व्यवस्था का जन्म हुआ. मगर ये बदलाव मुफ्त में नहीं मिले, इनके लिए भारी श्रम का मूल्य चुकाना पड़ा. शिकारी संग्राहक जहाँ प्रकृति के उगाये हुए को बड़े कौशल से हासिल करते थे, वहीं किसानों को खेत जोतना, निराई करना, फसल काटना और जानवर पालना जैसे अनगिनत श्रमसाध्य काम करने पड़ते थे. खेती की सफलता घंटों के अकुशल व बार बार दोहराए जाने वाले काम पर निर्भर थी, जो अधिकतर बच्चों से करवाए जाते थे. बड़े परिवारों में बच्चे अपने छोटे भाई बहनों का पेट भरने के लिए खेतों में काम करते थे. उन्हें घर पर रह कर इन छोटे छोटे बच्चों की देखभाल भी करनी पड़ती थी.  अपनी रूचि का काम करने की आजादी न रहने की वजह से धीरे धीरे बच्चों का जीवन बदलने लगा.अब उनका ज्यादा समय परिवार की जरूरतों को पूरा करने वाले श्रम में  खटने लगा.

खेती व उससे जुड़े भू- स्वामित्व तथा संपत्ति संग्रह ने इतिहास में पहली बार आदमी-आदमी के बीच हैसियत का फर्क पैदा कर दिया. जिन लोगों के पास जमीन नहीं थी वे भूस्वामियों पर निर्भर हो गए. इसके अलावा, जमीदारों को यह भी पता चल गया कि वे दूसरों से अपना काम करवा कर अपनी संपत्ति में इजाफा कर सकते हैं.  दासप्रथा और गुलामी के कई दूसरे रूप सामने आने लगे. सम्पत्तिवान लोग उन पर निर्भर  लोगों की मेहनत की बदौलत और संपत्ति बटोरने लगे. इन सब का परिणाम मध्य युग में सामंतवाद के आगमन में हुआ. समाज पूरी तरह से सत्ता-सोपानों  में बाँट गया. सत्ता सोपान के शीर्ष पर राजा और उसके दरबारी थे, जब्क्ली दासों और कामगारों की बड़ी आबादी सबसे निचले पायदान पर थी. समाज की बहुसंख्या, जिनमें बच्चे भी सामिल थे, पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ दिए गए. बच्चों के लिए सबसे बड़ा सबक था आदेश का पालन, अपनी इच्छाओं पर काबू पाना और स्वामियों व सरकार के प्रति सदैव आदरभाव रखना. विद्रोही विचार रखने वालों के लिए मौत तय थी.

मध्य युग में बच्चों को पीट पीट कर अपने सामने झुकाने में शक्तिशाली लोगों को जरा भी संकोच नहीं होता था. उदहारण के लिए, 14 वीं सदी के उत्तरार्ध या 15 वीं सदी की शुरुआत के एक दस्तावेज के मुताबिक एक फ़्रांसिसी काउंट ने शाही लड़ाकों को सलाह दी कि वे नौकर रखने के लिए लड़कों को सात आठ साल की उम्र में ही चुन लें और उसे इतना पीटें कि वह अपने मालिक के आदेश को ठुकराने की बात न सोचे. दस्तावेज आगे बताता है की लड़के से  रोजाना क्या क्या काम लिए जाने चाहिए और उसे रात को शिकारी कुत्तों में बाड़े की छत पर सुलाना चाहिए ताकि वह कुत्तों की जरूरतों को पूरा कर सके.

उद्योगों के उदय तथा एक नए शोषक वर्ग के जन्म के साथ सामंतवाद धीरे- धीरे समाप्त हो गया लेकिन इसके बावजूद ज्यादातर बच्चों की जिन्दगी से दुखों का अंत नहीं हुआ. नए व्यापारियों को पुराने जमीदारों की तरह श्रमिकों की जरूरत थी. और वे उन्हें कम से कम मेहनताना देकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते थे. आज हर कोई सामंतवाद के गर्भ से पैदा हुए शोषण तंत्र को जानता है और दुनिया के अधिकांश भाग पर यह आज भी कायम है.  लोग, जिनमें बच्चे भी सामिल हैं, जिन्दा रहने की खातिर जागते हुए ज्यादातर वक़्त काम करते रहते हैं. हफ्ते में सातों दिन... जानवरों जैसे हालात में. बच्चों को खुले हवादार खेतों की जगह, जहाँ उन्हें कभी कभार खेलने का मौका भी मिल जाता था, अब अँधेरी, बदबूदार व गन्दी फैक्ट्रीयों में काम करना पड़ता था. इंग्लैंड में गरीब तबकों के ओवर सीयर, कंगाल घरों के बच्चों को फैक्ट्रियों में ले आते थे, जहाँ उनके साथ गुलामों जैसा बर्ताव होता था. ऐसे हजारों बच्चे हर वर्ष बीमारी, भूख और कमजोरी की वजह से दम तोड़ देते थे. 19 वीं सदी तक यह सब चलता रहा, जब तक इंग्लैंड ने बाल श्रम पर कानून नहीं बना दिया. 1883 में एक नया कानून बना, जिसके मुताबिक कपड़ा उद्योग में 9 वर्ष से कम उम्र के बच्चे से काम लेना पर पाबन्दी लगा दी गयी. इसके अलावा 10 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए अधिकतम साप्ताहिक कार्य काल 48 घंटे तथा 13-17 वर्ष के लिए  69 घंटे कर दिया गया.

कुल मिलाकर, खेती के आगमन के बाद कई हजार वर्षों के दौरान बच्चों की शिक्षा का लगभग अर्थ था कि उनकी इच्छाओं को तहस- नहस कर उन्हें अच्छा  श्रमिक  बनाना. एक अच्छे बच्चे का मतलब था- एक आज्ञाकारी बच्चा, जो खेलने और खोजने की अपनी सहज वृत्ति को मारकर वयस्क मालिकों के आदेशों का पालन आँख मूँद कर पालन करे. ऐसी शिक्षा, सौभाग्यवश कभी कामयाब नहीं हो पाई. खेलने और खोजने की मानवीय वृत्तियां इतनी जबरदस्त होती हैं कि इन्हें किसी बच्चे के दिलो-दिमाग से रगेदा नहीं जा सकता. मगर इस पूरे युग का शिक्षा दर्शन शिकारी संग्राहक समाजों के सैकड़ों-हजारों वर्षों की समझ के लगभग पूरी तरह विपरीत था.

अनेक कारणों से- जिनमें कुछ धार्मिक थे  और कुछ धर्म निरपेक्ष, बाध्यकारी सार्विक शिक्षा का विचार धीरे धीरे फैलने लगा. शिक्षा 'दिमागों में ठूंसने' का पर्याय बन गई.

जैसे-जैसे उद्योगों का विकास होता गया और यह अधिकाधिक स्वचालित होते गए, दुनिया के कुछ हिस्सों में बल श्रम की ज़रूरत घटती चली गई. इसकी जगह यह विचार जगह बनाने लगा कि बचपन सीखने की उम्र है. और इस तरह सीखने की जगह के बतौर स्कूल खड़े किये जाने लगे. सार्विक एवं बाध्यकारी सार्वजानिक शिक्षा का विचार और व्यवहार 16वीं सदी के पूर्वार्ध में यूरोप में जन्मा और 19वीं सदी तक इसका काफी विस्तार हो गया. यह एक ऐसा विचार था, जिसके समाज में कई पैरोकार थे. बच्चों को कौन से पाठ पढ़ने चाहिए, इसके बारे में भी सबके अपने-अपने एजेंडे थे.

सार्विक शिक्षा के लिए सबसे ज्यादा जोर नए-नए उभरते प्रोटेस्टेंट धर्म ने लगाया. मार्टिन लूथर ने घोषणा की कि किसी व्यक्ति के लिए मुक्ति का मार्ग घर्मग्रंथों को खुद उसके द्वारा पढ़े जाने से ही खुल सकता है. यह सीख लूथर तक ही खत्म नहीं हो जाती, तब की समझदारी यही थी कि हर आदमी को पढ़ना सीखना पड़ेगा और यह जानना होगा कि अंतिम सत्य धर्मग्रंथों में ही बताया गया है तथा मुक्ति का मार्ग एकमात्र इस सत्य को जानने में निहित है. लूथर व दूसरे सुधारवादी नेताओं ने सार्वजानिक शिक्षा को ईसाई धार्मिक कर्तव्य बताते हुए जोर दिया कि नर्क की लपटों से अपनी आत्मा को बचाने का यही एक रास्ता है. १७वीं सदी के अंतिम वर्षों तक जर्मनी, जो अब तक स्कूलों के विकास में सबसे आगे था, के अधिकतर राज्यों में बच्चों को स्कूल भेजना कानूनन अनिवार्य बना दिया गया. लेकिन इन स्कूलों को सरकार नहीं बल्कि लूथरियाई चर्च चलाते थे.

अमेरिका में १७वीं सदी के मध्य में मैसाचुसेट्स पहला ऐसा राज्य बना जहाँ स्कूली शिक्षा अनिवार्य बना दी गयी. इसका उद्देश्य घोषित तौर पर बच्चों को धर्मनिष्ठ बनाना था. 1690 की शुरुआत तक मैसाचुसेट्स व इसके आस-पास की कालोनियों के बच्चे न्यू इंग्लेंड प्राइमर (जिसे न्यू इंग्लेंड की लिटल बाइबल भी कहा जाता था) पढ़ना सीख चुके थे. इस पुस्तक में अक्षर ज्ञान सिखाने वाले छोटे-छोटे बाल गीत थे, जो कुछ इस तरह से शुरू होते थे- "इन एडम्स फाल, वी सिन्ड ऑल." और इस तरह खत्म होते थे- "जाचेयस ही, डिड क्लाइम्ब ट्री, हिज लॉर्ड टू सी." पुस्तक में ईश प्रार्थना, ईसाई धर्म के सिद्धांत, दस कमांडमेंट (धर्मादेश) और बच्चों में ईश्वर का डर व बड़ों के प्रति आज्ञाकारिता का ज़ज्बा पैदा करने वाले कई पाठ थे.

उद्योगों के मालिकों को भी आज्ञाकारी कामगार तैयार करने में स्कूल की क्षमता का अंदाजा लगाने में देर नहीं लगी. उनके लिए समय की पाबन्दी, आदेशों का पालन, लंबे समय तक कठिन काम करने का धैर्य और पढ़ने-लिखने की न्यूनतम क्षमता जैसे गुण सबसे ज़रूरी पाठ थे. उनकी नज़र में (हालांकि उन्होंने इन शब्दों में इसे कहा नहीं) स्कूल का पाठ जिनता उबाऊ हो, उतना अच्छा.

जैसे-जैसे राष्ट्र जुड़ते और ज्यादा से ज्यादा केंद्रीकृत होते गए, राष्ट्रीय नेता स्कूली शिक्षा को वफादार देशभक्त और भावी सैनिक तैयार करने के माध्यम के रूप में देखने लगे. उनके हिसाब से मातृभूमि की महान गाथाएं, हैरतअंगेज उपलब्धियां और देश के संस्थापकों व नेताओं के नैतिक उपदेश तथा बाहरी दुष्ट ताकतों से देशरक्षा के ज़रूरत जैसे पाठ बच्चों को पढ़ाए जाने चाहिए.

स्कूली इतिहास की इस ऊबड़-खाबड़ राह में कुछ ऐसे सुधारक भी आये जिन्हें बच्चों की सचमुच परवाह थी. उनकी बातें आज भी हमारे कानों में गूंजती हैं. इन लोगों ने स्कूलों को एक ऐसी जगह की रूप में पहचाना, जहाँ बच्चों को बाहर की नुकसानदेह आबो-हवा से बचाया जा सकता है और उन्हें एक समर्थ व सक्षम नागरिक के रूप में विकसित करने के लिए ज़रूरी नैतिक एवं बौद्धिक आधार दिया जा सकती है. उनके मुताबिक बच्चों ने नैतिक पाठ एवं अनुशासन, जैसे- लैटिन व गणित आदि पढ़ना चाहिए ताकि उनके दिमाग की कसरत हो और वे बुद्धिजीवी बनकर निकलें.

इस तरह हर कोई स्कूल की स्थापना के पक्ष में था और बच्चों के लिए ज़रूरी पाठों के बारे में भी उसका स्पष्ट नजरिया था. ऐसे में ज़ाहिर सी बात है, कोई भी बच्चों को अपना रास्ता खुद बनाने देने की इजाजत देने को तैयार नहीं था. यहाँ तक कि सीखने के अत्यंत समृद्ध माहौल में भी बड़े वही पढ़ाना चाहते थे, जो उन्हें बच्चों के लिए ज़रूरी लगता था. सभी तयशुदा मूल्यों और तौर-तरीकों को बच्चों के "दिमाग में बिठाने या रोपने वाली प्रक्रिया" के अर्थ में शिक्षा को देखते थे. तब से आज तक बच्चों के दिमाग में ज्ञान रोपने की बस एक-मात्र विधि चलती आ रही है- जबरन दोहराना (रट्टा मारना) और दिमाग में बैठा कि नहीं, यह जांचने के लिए इम्तहान लेना.

स्कूली शिक्षा के विस्तार के साथ लोगों में यह सोच जड़ जमाने लगा कि सीखना बच्चों का काम है. किसी ज़माने में बच्चों के साथ खेतों और फैक्टरियों में काम करवाने के लिए की जाने जोर-जबरदस्ती अब कुदरतन कक्षाओं में पहुँच गयी.

पाठ को दोहराना और याद रखना बच्चों के लिए एक कठिन काम था. उनकी सहज वृत्ति उन्हें आज़ादी से खेलने और दुनिया को स्वयं अपने प्रयासों से खोजने के लिए प्रेरित करती थी. जिस तरह खेतों व फैक्टरियों में काम करने के लिए बच्चे आसानी से तैयार नहीं हुए, स्कूल जाने के लिए भी उन्होंने वैसे ही प्रतिरोध किया. इस प्रयास में शामिल बड़ों के लिए यह कोई हैरानी की बात नहीं थी. इतिहास के इस मुकाम पर, बच्चों की इच्छा का भी कोई मतलब होता है, यह बात किसी के दिमाग में भला आती भी कैसे! हर कोई यही सोचता था कि बच्चों को स्कूल भेजने के लिए उनकी मनमर्जी पर सख्ती से लगाम लगानी ही पड़ती है. हर तरह के दंड को शिक्षण प्रक्रिया का हिस्सा समझा जाता था. कुछ स्कूलों में बच्चों के खेलने के लिए अलग से अवकाश (मध्यांतर) की व्यवस्था होती थी लेकिन खेलों को कभी भी सीखने का वाहन नहीं समझा जाता था. कक्षा के भीतर तो खेल शिक्षा का दुश्मन ही समझा जाता था.

अठाहरवीं सदी के स्कूलों में खेलों के प्रति अधिकारीयों का रवैया जॉन वैस्ली के स्कूली नियमों कुछ इस तरह प्रकट हुआ: "जैसा कि हमारे यहाँ कोई खेल दिवस नहीं होता, हम खेल के लिए न तो कोई समय तय करते हैं न कोई दिन. क्योंकि जो बच्चा खेलता है वह बड़ा होकर भी खेलता रह जाता है."

किसी ज़माने में बच्चों से खेतों व फैक्टरियों में ज़बरन काम करवाने के लिए बर्बर तरीके इस्तेमाल किये जाते थे. वही तरीके स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए इस्तेमाल होने लगे. कम पगार पाने वाले, अप्रशिक्षित कई शिक्षक तो साफ़ तौर पर परपीड़क होते थे. जर्मनी में एक शिक्षक अपने 51 वर्ष के कार्यकाल में बच्चों की पिटाई का पूरा रिकॉर्ड रखा, जिसके मुताबिक उसने बच्चों को: लोहे की छड़ से 9,11,526 बार, बेंत से 1,24,010 बार, पटरी से 20,989 बार, हाथ से 1,36,715 बार पीटा, 10,235 बार उनका मुंह तोड़ा, 7,905 बार कान पर मुक्के जमाये और 11,18,800 बार उनकी खोपड़ी ठोकी. जाहिर है शिक्षक को उसकी द्वारा दी गयी शिक्षा पर गर्व भी होगा.

अठाहरवीं सदी में मैसाचुसेट्स में मंत्री रहे एक जाने-माने शख्स जॉन बर्नाड ने अपनी आत्मकथा में बड़े प्रशंसापूर्वक लिखा है कि उन्हें उनके स्कूल टीचर नियमित रूप से पीटते थे. वह खेलने की अपने बेलगाम आदत की वजह से मार खाते थे. इसके अलावा जब वह कक्षा में सीख नहीं पाते थे, तब मार खाते थे. इतना ही नहीं, वह तब भी पिटते थे जब उनके सहपाठी सीखने में नाकामयाब हो जाते थे. क्योंकि वह पढ़ाई में अव्वल थे, इसलिए उन पर औरों को सिखाने की भी ज़िम्मेदारी डाली गयी थी. इसलिए जब भी कोई सहपाठी जवाब नहीं देता था, बर्नाड साहब को मार कहानी पड़ती थी. लेकिन उन्हें इस पिटाई से कोई शिकायत नहीं थी, शिकायत थी तो अपने उस शरारती शरारती सहपाठी से, जो उन्हें पिटवाने के लिए जान बूझकर सवाल का जवाब नहीं देता था. उन्होंने इस समस्या का भी तोड़ निकाल लिया. एक दिन स्कूल से बाद उन्होंने इस सहपाठी की जमकर तुड़ाई कर डाली और साथ में यह हिदायत भी दी कि भविष्य में उसकी वजह से उन्हें पिटना पड़ा तो उसकी खैर नहीं. वे शानदार पुराने दिन...!

हाल के दिनों में स्कूली पढ़ाई के तौर-तरीके काफी हद तक बदल गए हैं. लेकिन उनके पीछे का बुनियादी विचार नहीं बदला है. सीखना, आज भी बच्चों का ही काम समझा जाता है और बच्चों से यह काम करवाने के लिए सख्त तौर-तरीके अब भी इस्तेमाल होते हैं.

19वीं और २०वीं सदी में सार्वजानिक शिक्षा उस दिशा की ओर बढ़ी, जैसी आज हम इसे पाते हैं. अनुशासन के तौर-तरीके और मानवीय होते गए. काफी हद तक पिटाई स्कूलों से गायब हो गयी. पाठ्यसामग्री पहले से ज्यादा धर्मनिरपेक्ष हो गयी. ज्ञान के विस्तार के साथ-साथ पाठ्यक्रम का विस्तार होता गया. विषयों की सूची लगातार लंबी होती चली गयी. इसके अलावा स्कूल के घंटों, दिनों और बाध्यकारी स्कूली वर्षों में भी इजाफा होता चला गया. खेत, फैक्टरी या घर में करवाए जाने वाले काम की जगह अब स्कूल ने ले ली. पढ़ाई करना बच्चे का प्राथमिक काम बन गया. जिस तरह बड़े रोज 8 घंटे अपने रोजगार की जगह जाते हैं, ठीक उसी तरह आज बच्चों को भी रोजाना 6 घंटे स्कूल में बिताने पड़ते हैं. इसके बाद वे एक घंटा या कुछ ज्यादा समय होमवर्क में लगाते हैं और इससे कहीं ज्यादा स्कूल से बहार ट्यूशन पढ़ने में. समय के साथ-साथ बच्चों का जीवन स्कूली पाठ्यक्रम से अधिकाधिक परिभाषित और नियंत्रित होता चला गया है. पूरी दुनिया में आज बच्चों के पहचान उनकी स्कूली कक्षा से की जाने लगी है. ठीक उसी तरह जैसे बड़ों की पहचान उनकी नौकरी या करियर से होती है.

स्कूल आज पहले जैसे कठोर नहीं रहे, लेकिन सीखने के बारे में कुछ प्रस्थापनाएँ आज भी जस की तस हैं. मसलन-सीखना एक कठिन काम है, जिसे बच्चों से पूरी सख्ती से करवाया जाना चाहिए. बच्चों को अपनी मर्जी से तय की गई गतिविधियों से कुदरतन शिक्षा नहीं मिलती, जिसके लिए उन्हें अनुशासित ढंग से पढ़ाया जाना ज़रूरी है. निर्धारित पाठ जिन्हें पढ़ना बच्चे के लिए ज़रूरी है, वे किसी पेशेवर शिक्षाविदों द्वारा ही तैयार किये जाने चाहिए, बच्चों द्वारा नहीं. इसलिए देखा जाय तो शिक्षा आज भी "दिमाग में ठूंसने" जैसी ही चीज़ है (हालांकि शिक्षाविद आज इस शब्द को इस्तेमाल करने से परहेज करते हैं और इसके जगह "डिस्कवरी" जैसे शब्द बोलते हैं).


Saturday, August 19, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - उनतीस



बीबन को देख गिरधारी और परमौत को हैरत हुई कि आधे घंटे पहले जो इंसान मुंह पर रज़ाई डाले खर्राटे मार रहा था वह अचानक आटा पिसवाने कहाँ चला गया होगा. इसके पहले कि वे अपने मेज़बान का अभिवादन करते, तीनों पर निगाह डाले बगैर वह सीधा घर में घुस गया. "आ बीबनौ! आ च्यला! आ पोथी! देर जैसी कर दी कहा आज तू ने! कब से तेरी बाट चा रहे कका तेरे.... चल रोटी-होटी खा ले पहले." कहती नब्बू डीयर की माँ की आवाज़ में पगा लाड़ बता रहा था कि बीबन उस घर का अन्तरंग है और वहां उसका नियमित आना-जाना है.

"बाबू को इंजेक्सन लगाने आने वाले हुए रोज सुबे एड्डीएम साब ... यही ठैरे झिंगेड़ी के सीएमओ सैप!" नब्बू डीयर ने बीबन के एक और आयाम से अपने दोस्तों को परिचित कराते हुए कहा. गिरधारी लम्बू और परमौत को याद आया कि वे पिछली रात के कार्यक्रम के बारे में नब्बू को बताना भूल गए थे.

"तुमारे बीबनदा हुए तो गजब्बी यार नब्बू गुरु ..." गिरधारी बोलना शुरू कर ही रहा था कि नब्बू ने मुस्कराते हुए पूछा - "रात में कुछ जमीन-हमीन तुमारे नाम करी भी या ऐसेई ल्यफ्टराइट कराते रहे दाज्यू?"

अब तक बीबन के कपड़ों वगैरह पर लगे आटे के निशानों की गुत्थी को समझने का प्रयास कर रहे परमौत और गिरधारी, दोनों को एक साथ सब कुछ याद आ गया और उनकी हंसी फट पड़ी. उन्होंने दबी आवाज़ में पिछली रात के विवरण नब्बू को देने शुरू किये लेकिन उन्हें सुनते हुए नब्बू के चेहरे पर के भावों में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं आया. परमौत और गिरधारी लम्बू ने नब्बू की इस उत्साहीनता का सबब उसकी खराब तबीयत को माना और किस्से को अधिक लंबा नहीं खींचा. फिर भी उन्हें उम्मीद थी कि इस किस्सागोई के एवज़ में नब्बू की तरफ से कोई चुटीला कमेन्ट आएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कुछ पल खामोशी रही फिर अचानक उदास हो आए नब्बू ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा - "कब का ग्रेजुएट हुआ यार हमारा बीबनदा! कितना करा बिचारे ने पर साली नौकरी लगी ही नहीं कहीं! बस ऐसे ही पगली गया हुआ दो-तीन साल से. कब्ब से सड़ रहा हुआ यहीं झिंगेड़ी में. ये उसकी परेड-फरेड तो यहाँ के बच्चों तक को मालूम हुई. रोज़ रात का काम हुआ उसका. नींद जो क्या आती है बिचारे को, परमौती भाई. ऐसेई हुआ सब साला ... "

उनकी थालियाँ उठाकर गोठ की तरफ जाते हुए उसने पलटकर देखा और अपनी बात जारी रखी - "... मल्लब मुजको बी जो है आठ पास करने के बाद जिद्द करके बीबनदा ने ही भिजाया ठैरा हल्द्वानी. बाबू से कहने वाला हुआ कि कका पड़े-लिखे आदमी की ही कदर होने वाली हुई जमाने में. नहीं तो हमारे बाबू की न तो साली औकात हुई न वैसी मत्ति कि लौंडे को स्कूल-हिस्कूल कहाँ भेजो, क्या करो, क्या ना करो. है नी है! ..."

नब्बू वापस उनकी बगल में आकर बैठ चुका था - "पड़े-लिखे की ऐसी ही कुकुरगत हुई आजकल साली. नहीं तो बीबन जैसा एक्क आदमी नहीं हुआ ये पूरे इलाके में एक जमाने में यार."

बीबन की हालत से नब्बू सचमुच दुखी था और अपनी बात को अचानक विराम देता हुआ चुप हो गया. परमौत और गिरधारी भी सहमकर चुप हो गए. अनजाने ही दोनों की निगाहें एक साथ घर की बंद खिड़की पर लग गईं जिसके पीछे नब्बू डीयर के बीमार और अपंग पिता थे जिनसे अभी उनकी पहली मुलाक़ात होना थी, बात-बात पर आँखों में आंसू भर लाने वाली उसकी असमय बुढ़िया हो गयी दिखने वाली माँ थी और फिलहाल कम्पाउंडर बना हुआ बीबन था जिसे वे अब तक गाँव का एक दिलचस्प अलबत्ता पागल कैरेक्टर भर समझ रहे थे.

"कोई ढंग का इलाज क्यों नहीं कराया होना यार नबदा फिर ...?" भारी होती जा रही खामोशी को तोड़ते गिरधारी ने झिझकते हुए पूछा.

"अबे गिरधर गुरु, कौन करता इलाज? हैं? मल्लब किस-किस आदमी का इलाज कराएगा कोई? और कहाँ से कराएगा? बचदा कराएगा? मेरे बाबू कराएंगे? या फिर मैं कराता हूँ? ..."

"ऐसे जो क्या ..." गिरधारी अचकचा गया.

"ये साला अल्मोड़े से आगे जो है न ... मल्लब कोई सरकार-फरकार जो क्या बैठ रही हमारे ईजा-बाबू बन के कि जो साला बीमार होगा उसका इलाज कराएगी...! अगर बीबनदा के ईजा-बाबू जिन्दा होते भी ना तो बिचारे कहाँ से कराते यार इलाज? आब मेरे बाबू चार महीने से बिस्तरे में हग-मूत रहे हुए. कौन सा कोई डाक्टर आ रहा उनका इलाज करने को. हैं? एक-दो बार डोली-होली कर के बागेस्वर ले गए सरकारी अस्पताल में तो वहां जो है परमौती उस्ताज ... नहीं भी होंगे हमारे जैसे सौ आदमी और होंगे ... किसी की हड्डी टूट रही, किसी का पेट अमोरी रहा, किसी की आँख फूट रही, किसी को पैन्चो दस्त लग रहे ... कहाँ से होता है ढंग का इलाज ..."

परमौत का पाला न कभी गरीबी से पड़ा था न अस्पताल से. उसकी माँ उसके जन्म के बाद मर गयी थी जबकि बाबू को रात सोते में दिल का दौरा पड़ा था. अस्पताल से सम्बंधित उसकी सीमित स्मृतियाँ बस भाई-भाभी के बच्चों के जन्म के समय हल्द्वानी के इकलौते नर्सिंग होम में खाना पहुंचाने भर की थीं. घर पर किसी के भी बीमार होने की सूरत में डाक्टर जोशी दस मिनट में घर पहुंच जाया करते थे. नब्बू की बातें सुन कर उसने पहली बार बीमारों की तीमारदारी करने में होने वाले कष्ट की कल्पना करनी शुरू की और वह सिहर उठा. नब्बू जितनी ही गरीब पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाला गिरधारी नब्बू का दर्द पूरी तरह समझ पा रहा था.

"... ऐसेई मरने वाले हुए गाँव के लोग साले ... वो भी भुस्स पहाड़ी गाँव के लोग ... बीबनदा का इलाज कौन कराता है गिरधारी गुरु? यहाँ अपनी जान बचाना मुस्किल हो रहा साला. अबे मेरे को ही देख लो. इतने दिन हो गए अस्पताल गए हुए ... कहाँ से जाता हूँ? कैसे जाता हूँ? हल्द्वानी जो क्या हुआ जो चट्ट से रिक्सा करा और पौंच गए डाक्टर के पास. दस दफे सोचना पड़ने वाला हुआ यार. फिर बागेस्वर में डाक्टर मिल ही जाएगा इसकी क्या गारंटी हुई? आधे टाइम तो छुट्टी पर रहने वाले हुए साले ..."

"... अब तू मर जाता है भलै, नबदा!" माहौल में बढ़ती जा रही डरावनी मनहूसियत से भयाक्रांत होकर गिरधारी ने विषयांतर करने की नीयत से नब्बू डीयर की पीठ पर हल्की सी थाप मारते हुए मज़ाक किया.

नब्बू बात समाप्त करने के मूड में नहीं था - "अब देखो परमौती वस्ताज, ये जो हमारे गिरधारी गुरु कह रहे हुए कि बीबनदा का ढंग का इलाज क्यों नहीं कराते हो तो बात तो इनकी सही ठैरी एक तरह से मल्लब. लेकिन सवाल ये हुआ कि बीबनदा की जरूअत किसको हुई. या मेरे बाबू ने कौन सा दुनिया का काम सपाड़ रखा हुआ आज तक. त्तो ... उनकी भी जरूअत किसी को नहीं हुई ... तो इसका मल्लब ये हुआ कि जिसकी साली जरूअत ही नहीं हुई तो वो ज़िंदा क्यों रह रहा हुआ? मल्लब उसको जिन्दा रैने का कोई हक ही साला क्यों हुआ? ... है नईं है? ..."

परमौत को नब्बू के इन सटीक वक्तव्यों से हल्की असुविधा होने लगी थी. उसने भावुक होते हुए नब्बू का हाथ थाम लिया - "ऐसे जो क्या होने वाला हुआ यार नब्बू ... ऐसे जो क्या ..."

नब्बू खुद रुआंसा हो गया था - "लेकिन मुकेस गुरु क्या कैने वाले हुए परमौती वस्ताज कि जीना यहाँ और मरना यहाँ और जो है इसके सिवा जाना कहाँ ... तो यहीं जीना ठैरा और यहीं मरना भी ठैरा ... तो इसी चक्कर में सब लगे ठैरे ... आदमी जो हुआ ना ... मल्लब आदमी चीज ऐसी हुई कि साला जब तक मरेगा नहीं तब तक आदमी ही होने वाला हुआ ... कोई साला कुकुर-बिरालू जो क्या हो रहा हुआ ..." परमौत और गिरधारी पिछले मिनटों में नोटिस कर रहे थे कि हल्द्वानी से अपने गाँव वापस आने के बाद में महीनों में काइयां नब्बू में खासा बदलाव आ गया था और वह अनापेक्षित रूप से बुद्धिमत्तापूर्ण बातें कर रहा था. वह किसी ज्ञानी संत की तरह प्रवचन दे रहा था और वे दोनों लाटे बनकर उसे सुनने को मजबूर बना दिए गए थे. अलबत्ता अभी-अभी नब्बू डीयर द्वारा मुकेश के गाने का ज़िक्र किये जाने से दोनों की देहों में एक मीठी झुरझुरी पैदा हुई जैसा सिर्फ गोदाम में हुआ करता था.

इन्हीं शोक-शिरोमणि के एक और गीत का ज़िक्र करते हुए नब्बू ने बात आगे बढ़ाई - "मुकेश गुरु ने ऐसेई माहौल के लिए कहा ठैरा ... आहा ..." वह अपनी पुरानी रौ में आ गया लगता था - "क्या कैने वाले हुए कि ... किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार. और किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार ... तो जीना इसी का नाम हुआ ... मल्लब ये हुआ कि डाक्टर-फाक्टर और सरकार-फरकार के चक्कर में पड़ने का काम जो क्या हुआ साला ... आदमी जो है, जैसा भी हुआ किसी न किसी के कुछ न कुछ काम का जरूर होने वाला हुआ ... कैने को हमारा बीबनदा हुआ पगलेट. डिमाग खराब हो गया ठैरा उसका - सब ऐसे ही बताने वाले हुए. लेकिन ये साला झिंगेड़ी और आसपास के दस गाँव में इंजेक्सन लगाना उसी को आने वाला हुआ. थर्मामीटर देखना उसको आने वाला हुआ. जर-बुखार की दवाई ऐसेई बता देने वाला हुआ कि एनासीन खा लो क्लोरोकुनीन खा लो मल्लब ... वैसे कहते हो तो पागल हुआ बीबनदा ... रात को ल्यफ्टराइट करने वाला हुआ. जमीन बांटने वाला हुआ सबको ... बस देने वाला हुआ ... लेने वाला किसी से कुच्छ नहीं हुआ ... मांगने वाला भी नईं हुआ. त्तो ... मुकेश गुरु जो कैने वाले ठैरे जीना जो हुआ इसका नाम हुआ ... है नी है? मेरा कहने का मल्लब हुआ कि आदमी पगलेट भी हुआ तो भगवान ने उसको भी कुछ ऐसा दे कर के दुनिया भेजा ठैरा जो उसको कुकुर-बिरालू से जादे बड़ा बनाने वाला हुआ ... अब पगलेट साला चाहे झिंगेड़ी में रह रहा हो चाहे हल्द्वानी में चाहे पैन्चो अमरीका में ..."

नब्बू डीयर की बात समाप्त हो गयी थी और उसने संभवतः जीवन में पहली बार किसी विषय को इतनी देर तक इतने सटीक और प्रभावी तरीके से जुबान दी थी. उसने परमौत और गिरधारी के मन में बीबन की इमेज की जायज़ ओवरहॉलिंग कर दी थी. तनिक हकबकाए हुए दोनों के भीतर नब्बू के लिए अथाह लाड़ और अपनापन उमड़ने लगा था.

"नबदा गुरु ऐसा है ... हम तो जो है यहाँ झिंगेड़ी आये रहे तेरे को देखने बस. बीबनदा के इलाज की बात वापिस जाके करेंगे. अभी तो बस ये है कि तू अपना झोला-झिमटा बाँध और चल ... आज रात बागेश्वर रुकते हैं. कोई होटल-फोटल कर लेंगे ... कल सूबेदार की गाड़ी लेके हल्द्वानी चलते हैं ... पहले तेरे को ठीक होना हुआ ... बाकी सब उसी के बाद ठीक होने वाला हुआ ... फिर तेरी ब्वारी भी मुझसे कह रही हुई कि जेठज्यू कब आएँगे हल्द्वानी मूँदिखाई का पेमेंट करने को ..." परमौत ने नब्बू की पसली को मोहब्बत से कौंचा तो माहौल एक झटके में रवां हो गया और नब्बू डीयर ने पुनः सनातन कमीनावस्था प्राप्त कर ली. अपना एक पुराना डायलॉग दुहराता हुआ वह बोला - 

"अबे कहाँ की ब्वारी बे खबीस परमौतिये! बस एक तुमी से पट रई बेटे लौंडिया! साले असली वाली फोटुक-होटुक कुछ जुगाड़ करी कि गिरधरुवे ने? या अभी भी वोई साले रात भर ..." पिरिया के मामले में परमौत इस से अधिक जलालत बर्दाश्त करने के मूड में नहीं था. उसने पैंट के जेब में खुंसाया हुआ पिरिया का रूमाल निकालकर नब्बू डीयर के सामने प्रस्तुत करते हुए किंचित गौरव के साथ कहा - "ब्वारी का रूमाल जब आ गया तो साली फोटो का क्या करना है यार माय डीयर नब्बू हौकलेट!"

"दिखा, दिखा" कहता नब्बू उसे झपटने को हुआ तो परमौत ने रूमाल वापस जेब में घुसा लिया.

नब्बू ने आस-पास चोरों की तरह देखते हुए कहा - "कुछ गेम बना लौंडिया के संग या ऐसेई बस कैरमबोट पे पौडर जैसा डाल रा अबी भी?"

गिरधारी फोटो जुगाड़ करने की अपनी कोशिशों और  परमौत के पिरिया को मोपेड पर बिठाकर हल्द्वानी की बाज़ार का चक्कर लगा आने के किस्से को बढ़ा-चढ़ाकर सुनाने की प्रस्तावना बना ही रहा था कि बीबन बाहर निकला. तीनों ने अपनी खुसरफुसर बंद कर दी. बीबन ने उन पर एक बेपरवाह सी निगाह डाली और पटांगण के एक कोने पर धरी बाल्टी से पानी लेकर हाथ-मुंह धोने लगा. नब्बू डीयर ने कृतज्ञ स्वर में पूछा - "हो गया हो बीबनदा? अब कितने इंजेक्सन लगाने और रह गए?"

कुल्ला करते-करते ही बीबन ने तीन उंगलियाँ उठाकर उत्तर दिया और काफी देर तक किसी बिल्ली की सी तन्मयता के साथ अपना चेहरा साफ़ करता रहा.

(जारी)

Thursday, August 17, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - अठ्ठाइस

(फोटो: https://travelshoebum.com से साभार)

नब्बू डीयर ने अपने सखाओं के साथ हल्द्वानी चलने का फैसला करने के लिए एक दिन की मोहलत माँगी जिसे थोड़े ना-नुकुर के बाद स्वीकार कर लिया गया. दरअसल पिछले तीन दिनों से जिस तरह का जीवन गिरधारी और परमौत जी रहे थे, खुद उनकी अपनी देहें भी उनसे एक दिन की मोहलत मांग रही थीं.

पिछली रात के डिनर और उस के बाद की घटनाओं की अप्रत्याशितता ने उन की नींद की ऐसी-तैसी कर दी थी. खड़ा-खड़ा बीबन पहले तो खाना खा रहे मेहमानों की थालियों पर टॉर्च चमकाता रहा. बचेसिंह द्वारा एक बार झिड़के जाने पर उसने टॉर्च बुझा दी और बाहर चला गया. परमौत उससे रुकने का आग्रह करना चाहता था लेकिन बचेसिंह ने इशारे से कहा कि उसे चढ़ गयी है और उसका घटनास्थल से बाहर चला जाना ही श्रेयस्कर है.  खाना खाते हुए बचेसिंह ने हल्द्वानी से आए मेहमानों को झिंगेड़ी में  प्रचलित एकाधिक दन्तकथाएं सुनाईं जिनका विषयसूत्र एक ही था - बीबन को दारू नहीं पचती. इस सीरीज की चौथी और महा-अझेल कथा का वाचन हो रहा था जब बाहर से बीबन की क्रमशः ऊंची होती आवाज़ आनी शुरू हुई - "साइमन कमीसन गो बैक! इन्द्रा गांदी जिंदाबाद! जन्ता पाल्टी जिन्दाबाद! मात्मा गांदी कम बैक! ..."

खाना छोड़ तीनों खिड़की से बाहर देखने लगे. पटांगण के पटालों पर चांदनी दमक रही थी और जॉन साइमन से लेकर इन्द्रा गांधी तक की जागर लगाए बीबन एसडीएम मुल्क के पचास साल के इतिहास को लेफ़्ट राईट परेड करवा रहा था. झिंगेड़ी की फिज़ा में क्रान्ति तैराकी कर रही थी. गिरधारी और परमौत को यह दृश्य बहुत लुभावना लगा. बचेसिंह वापस खाने की थाली पर लौट गया था. अचानक वह "बोतल भी उठा ले गया रे साले बीबनौ ..." कहता हुआ दरवाज़े से बाहर लपका. जब तक परमौत और गिरधारी चौंक कर पलटते, बचेसिंह पटांगण तक पहुँच गया था और बीबन की खोपड़ी पर एक रैपट खींच चुका था.

"थम!" कहकर बीबन ने अपनी परेड को विराम दिया. बचेसिंह द्वारा किये गए कृत्य से वह ज़रा भी विचलित नहीं हुआ लगता था. इसके पहले कि बचेसिंह अगला रैपट लगाता, वह उछलकर पटांगण की दीवार पर चढ़ गया और मुठ्ठी का माइक बनाकर भाषण देने लगा - "फ्रेन्ड्स, रोमन्स एंड कंट्रीम्यन, दिस इज दी डे ऑफ दी रिपब्लिक ऑफ ए इन्ड्या एंड लेप्टन जन्नल भी.पी. सिंग फ्रॉम दी आलइन्ड्या रेडियो इज वेल्कमिंग यू इन झिंगेड़ी बेकौज साइमन इज गोइंग टू बागेस्वर एज अ सरभेंट ऑफ दी इन्द्रा गांदी ... लेफ्फाईट लेफ्फाईट ल्याफ्ट ..." संक्षिप्त प्रस्तावना के बाद अब वह दीवार पर ही परेड करने लगा.

बचेसिंह का उठा हुआ हाथ अब नीचे आ गया था और वह भी परमौत और गिरधारी की तरह बीबन की पर्फौरमेन्स के मज़े लेने के मूड में था. एकाध मिनट तक बीबन ने परेड की और बचेसिंह की तरफ से कोई कार्रवाई न होती देख सम्हाल कर नीचे उतर गया. नीचे उतरते ही उसने सावधान की मुद्रा अख्तियार कर ली और ज़मीन से निगाह चिपका कर बोला - "नाउ देयर इज ए टाइम ऑफ़ दी सैलेंस एज ऑफ टू मिनट फॉर दी ड्यथ ऑफ मात्मा गांदी हू इज फ़ादर ऑफ नेशन."

बीबन ने दो मिनट का तो नहीं आधे मिनट का मौन रखकर बाकायदा राष्ट्रपिता के लिए शोक प्रदर्शित किया और बचेसिंह के एक ही बार "उप्पर चल के एक रोटी खा लेता यार बीबनौ ..." कहते ही भीगी बकरी की तरह वापस कमरे में आ गया.

परमौत और गिरधारी ने जीवन में ऐसे एक से एक सांस्कृतिक कार्यक्रम देख रखे थे और वे इन्हीं दुर्लभ क्षणों को हर महफ़िल का कुल हासिल मानते थे. इन कार्यक्रमों की ख़ूबी यह होती थी कि एक बार शुरू हो जाने के बाद वे कब और किस मरहले पर तमाम होंगे - इसका जवाब दुनिया का सबसे बड़ा नजूमी भी नहीं दे सकता था. ये कार्यक्रम भविष्य की महफ़िलों के मनोरंजन के लिए खाद का काम भी करते थे जिनमें इन कार्यक्रमों की एक-एक तफसील का कई-कई बात दोहराव किया जाना होता था. बीबन के एकल कार्यक्रम के अगले चरण के दीदार की हसरत से सराबोर उनकी निगाहें चौकन्नी हो गईं. बैठने से पहले, बाहर से लाई गयी खाली बोतल को किसी शील्ड की तरह प्रदर्शित करते बचेसिंह ने सूजा हुआ मुंह बनाकर दोनों को इत्तला देते हुए शर्मिंदगी भरा अफ़सोस ज़ाहिर किया कि बीबन ने बोतल में बचा हुआ पव्वे से अधिक माल अकेले निबटा दिया.

"कुत्तूं को घी जो क्या पचने वाला हुआ परमौद्दा ..." जैसा कोई वक्तव्य देकर बचेसिंह अपराधी को कुछ और लताड़ लगाने की नीयत रखता था लेकिन बीबन भीतर आते ही अपने बिस्तर पर कटे पेड़ जैसा गिरा और सो गया. परमौत और गिरधारी को दो बातों का अफ़सोस हुआ - बोतल निबट गयी थी और बीबन सो गया था.

बरतन वगैरह उठाकर बाहर रखने और मेजबानी के अन्य कार्यों को त्वरित गति से समाप्त कर बचेसिंह ने पुनः क्षमायाचना की - "सारी दावत बिगाड़ के रख दी साले ने परमौद्दा ... माफ करना हो सैप ... पी-ही के ऐसेई करने वाला हुआ बीबन हर बार ..." कुत्तों को घी न पचने वाले मुहावरे को दोहराया गया. जाने से पहले बचेसिंह ने मेहमानों को उनके बिस्तर तक छोड़ा और अगली सुबह चाय-नाश्ते पर अपने घर मिलने की बात कही.

परमौत और गिरधारी ने थोड़ी देर बीबन की साइमन-परेड की बाबत हल्का-फुल्का वार्तालाप किया और थकान और नशे के मिश्रण से किसी पल दोनों की आँख लग गयी.

"व्हेन! व्हेन! ..." गिरधारी के सपने में कोई अंग्रेज़ी में पूछ रहा था.

"व्हाट! व्हाट! ..." गिरधारी की अचानक आँख खुली तो उसने पाया कि आवाज़ बगल के कमरे से आ रही थी. उसे यह समझने  में थोड़ा वक़्त लगा कि परमौत उसकी बगल में सोया हुआ है और वे बीबन के घर पर हैं. "व्हेन! व्हेन! ..." के दोबारा होने पर गिरधारी को लगा वह नींद में बड़बड़ा रहा होगा. उसने करवट बदल कर सोने की कोशिश की. खिड़की के खुले हुए पल्ले से भीतर आ रही चाँदनी के उजाले में उसने देखा कि परमौत का मुंह खुला हुआ था और वह हल्के खर्राटे ले रहा था.

करवट बदलते ही बीबन के कमरे से माता-पिता का स्मरण करती "ओइजा ... ओबा ..." की कराह जैसी निकली. आँखें बंद करने की कोशिश करते गिरधारी को अहसास हुआ कि उनका मेज़बान उठ गया है और दरवाज़े की तलाश में है. कुछ देर सांकल की खड़खड़ हुई और अंततः चरमराहट की विलंबित ध्वनि के साथ दरवाज़ा खुला. पटांगण से बीबन के डगमग क़दमों की धीमी चाप आने लगी तो गिरधारी के सोचा कि उसे किसी तरह की हाजत का निपटान करना होगा. उनींदे गिरधारी ने टटोलकर सिरहाने रखी घड़ी में समय देखा. रेडियम लगी सुइयां बता रही थीं कि साढ़े बारह बज गया था. 

गिरधारी ने जम्हाई ली और असमय टूट गयी नींद को वापस लाने के प्रयास में सन्नद्ध हो गया.

"व्हेन! व्हेन! ..." गिरधारी के सपने में किसी ने फिर से पूछना शुरू किया.

"पैन्चो ..." धीमी आवाज़ में के उच्चार के साथ इस बार न सिर्फ गिरधारी सपने से जागा बल्कि खीझ कर उठ खड़ा हुआ. वह बीबन के कमरे की तरफ जा रहा था कि उसकी निगाह खुले दरवाज़े पर गिरी. बाहर से वापस आकर बीबन शायद दरवाज़ा बंद करना भूल गया था. गिरधारी दो सीढ़ियां उतरकर दरवाज़ा बंद करने ही वाला था कि उसने देखा कि पटांगण में टॉर्च जलाकर बैठा बीबन एसडीएम एक बड़े से कागज़ पर निगाहें गड़ाए झुका बैठा था. अनुभवी गिरधारी ने अपने मन में बीबन के प्रति उभर रही नापसंदगी को पार्श्व में धकेलकर सहानुभूति के लिए राह बनाई और दबे कदमों बीबन के पास जाकर खड़ा हो गया.

पटाल पर धरा कागज़ किसी किस्म का नक्शा लग रहा था. बीबन की बगल में उकडूं बैठते हुए गिरधारी ने धीमे से पूछा - "क्या चल रा है विपिन बाबू?"

गिरधारी के आगमन से बीबन की एकाग्रता ज़रा भी भंग नहीं हुई और उसने नक़्शे पर एक जगह अपनी उंगली स्थिर करते हुए बस "हूँ ..." की आवाज़ निकाली.

"कोई खजाना ढूंढ रहे हो बीबनदा सायद. ... हैं? मल्लब ..."

परिचित नाम से आदरसहित पुकारे जाने का असर यह हुआ कि बीबन ने आँख उठाकर गिरधारी को देखा और कहना शुरू किया - "झिंगेड़ी का नक्सा है ... झिंगेड़ी का." अपनी स्थिर उंगली को एक बार उठाकर वापस नक़्शे पर रखते हुए वह बोला - "ये हुआ हमारा मकान ... और ये ठैरे हमारे खेत वगैरौ ..." श्रमपूर्वक बनाए गए नक़्शे में चिन्हित किये गए हिस्सों पर क्रमशः उंगली धरते हुए बीबन ने अपने पैतृक खेत गिनाना शुरू किया - "नहीं बी होगी तीन शौ नाली जमीन होगी बाबू के नाम पर कम शे कम ... थिरी हंड्रेड ... और मल्लब ... ये हुआ खड़कदा का खेत ... यहाँ से आघे फिर हमारा खेत हुआ वो उद्धर गोलज्यू के थान तक ... फीर आघे घनुवा पन्थ के खेत हुए ... उशके आघे फीर हमारेई हुए ..."

गिरधारी अचानक बिलकुल चौकस हो गया. बीबन की एकचित्तता देखकर गिरधारी समझ गया कि सांस्कृतिक कार्यक्रम अभी समाप्त नहीं हुआ है और थोड़े से धैर्य और मशक्कत से अर्थात बीबन की सायास जुगलबंदी करने के उपरान्त मौज के नए आसमान खोले जा सकते हैं.

"मल्लब आप तो यहाँ के जमींदार टाइप हुए यार बीबनदा ... क्या बात है ... गज्जब ..." - गिरधारी द्वारा दिए गए प्रोत्साहन ने बीबन को थोड़ा सा कांफिडेंस दे दिया और वह "एक मिनट रुको जरा!" कहकर डगमगाता हुआ निचली मंजिल के गोठ की तरफ चला गया. वापस आया तो उसके हाथ में एक सफ़ेद ढेला था. उसने ढेले को नक़्शे पर रखा और गिरधारी को रहस्योद्घाटन करने के स्वर में बताने लगा - "ये वाली खड़िया निकली ठैरी इस वाले खेत से ..." उसने एक खेत पर उंगली रखी - "... और इसके बगल वाला ... ये खेत हुआ बचदा का ... उसके बाद आघे के बीश-तीश हमारे हुए ... और ... अग्गर ... शब में खड़िया निकल गयी तो महीने के पांच-सात हजार निकल जाने का काम हुआ ... मल्लब फाईब-सेभन थाउजेंड एभरी मंथ ... अब दिक्कत ये आ रही हुई जो है कि पटवारी साला है अंग्रेजों का आदमी ... हम ठैरे गद्दर पाल्टी वाले ... कल कोई साला जॉन-फॉन टाइप का अंग्रेज कलक्टर आ के कैता है कि मिश्टर भीपीसिंग यू आर अंडर अरैस्ट तो मुझको तो हो जाने वाली हुई कालापानी ... मल्लब आइसलैंड ऑफ दी अंडमान एंड निकोबार ..."

सीधे-सादे पहाड़ी खेतों में अंग्रेज़ कलेक्टर की एंट्री से गिरधारी इतना उत्साहित हुआ कि इस बार उसने कहा - "एक मिनट!" और भीतर चला गया जहां हल्द्वानी से सीखी डिज़ास्टर-मैनेजमेंट की कला के पहले पाठ के तौर पर बागेश्वर से खरीदा गया इमरजेंसी कोटा झोले से बाहर निकाले जाने की पुकार लगाने लगा था. नया कुबद्दर करने की प्रेरणा से उपजे उत्साह से पूरित हो वह अपने झोले को खोलकर उसमें सबसे नीचे अड़ाकर रखे अद्धे को निकालने की कोशिश कर रहा था कि खटर-पटर से परमौत की आँख खुल गयी. परमौत ने अचम्भे से उसे देखा तो गिरधारी ने संक्षेप में बाहर चल रहे कार्यक्रम से अवगत कराया और साथ चलने की दावत दी.

पटांगण में अद्धा खोला जा चुका था, कांसे के गिलासों में उसके भीतर का पदार्थ ढाला जा चुका था और इस आशातीत घटनाक्रम ने बीबन के इतिहासकार को जगा दिया था - "... एक बार मिस्टर एठकिशन कमिस्नर नैनताल से बागेस्वर आया हुआ दौरे पर तो मेरे बड़बाज्यू के बड़बाज्यू ने उशको और उशके पाटनर को कोटपीश में हरा दिया हुआ ... मल्लब फुल डिफीट ऑफ दी इंग्लिस ... त्तो ... उशने क्या किया कि मेरे बड़बाज्यू के बड़बाज्यू को बना दिया रायबहादुर और झिंगेड़ी की रियासत तोफे में दे दी हुई. तब से हुए हम यहाँ के जिमीदार फैमली ... वो तो इन्द्रा गांदी ने इमर्जेंटी लगा दी नईं  तो हमारे यहाँ तो हाथी भी रहने वाले हुए ..."

बीबन के दिमाग पर उसकी क्रमिक असफलताओं ने गहरा असर किया था. अमूमन मितभाषी लेकिन पर्याप्त चढ़ जाने पर वाचाल हो जाने वाला, किसी समय गाँव का पहला ग्रेजुएट बन चुका बेरोज़गार बीबन अंग्रेजों और इंदिरा गांधी को अपनी सारी आपदाओं का ज़िम्मेदार मानता था. स्पष्ट शब्दों में कहा जाय तो ऐतिहासिक कारणों से उसकी चवन्नी गिर चुकी थी जिसके मिल पाने की संभावनाएं नगण्य थीं. सो वह पूरी शिद्दत से अपने मस्तिष्क के भीतर चल रही गड्डमड्ड को अनवरत शब्द देता जा रहा था और इस बण्डलहांक को सुनने का लुत्फ़ उठाते गिरधारी और परमौत एक दूसरे को इशारे करते हुए मौज ले रहे थे और बीच-बीच में "गजब दाज्यू गज्जब ..." कहते हुए बीबन का उत्साह बढ़ाते चलते.

बीबन के पास देश, गाँव और ब्रह्माण्ड के समाजशास्त्र, इतिहास और भूगोल को लेकर अनेक नवल विचार थे जिन्हें सुनने को पहली बार उसे ऐसे तत्पर श्रोता मिले थे. इमरजेंसी कोटे का आधा हिस्सा बीबन को समर्पित हुआ. एटकिंसन से लेकर हैनरी रैमजे और लाजपतराय से लेकर संजय गांधी तक तमाम चरित्र बीबन के बेमतलब एकालाप का हिस्सा बनते रहे और उसकी जुबान क्रमशः लड़खड़ावस्था के क्रमिक स्तरों का आरोहण करती गयी. आधे घंटे बाद कुछ भी नया न घटते देख और रात के वास्ते पर्याप्त मनोरंजन प्राप्त कर चुके परमौत और गिरधारी चट से गए तो उन्होंने कार्यक्रम को मुल्तवी करने की बात छेड़ी और जम्हाई लेते हुए उठने का उपक्रम चालू किया.

बीबन अब सिर्फ अंगरेजी बोल रहा था - "दी लेप्टन जन्नल ऑफ दी गोरमेन्ट ऑफ इण्डिया इज ए नॉन-क्वाप्रेटिव सोल्जर इन दी भिलेज ऑफ झिंगेड़ी बाय दी औडर इन दी रिपब्लिक डे परेड एज ए बागेस्वर ..."

परमौत और गिरधारी उठकर जाने को हुए तो एकालाप पर विराम लगाते हुए बीबन ने उन पर एक तटस्थ निगाह फेरी और खुद भी खड़ा हो गया. उसके चेहरे पर किसी संत का निष्कपट भाव था. "एक मिनट! वन मिनट ओनली शर!" कह कर वह फिर से गोठ में घुस गया. इस बार उसके हाथ में कपड़े का एक थैला था - "आप लोग इन्नी दूर शे झिंगेड़ी आए रहे ... कुछ तो तोफा आपको देना पड़ने वाला हुआ मल्लब ... आइये शर पिलीच!" वह घर की चारदीवार से बाहर निकल गया और अपनी टॉर्च उनकी दिशा में चमकाने लगा. मरता क्या न करता की तर्ज़ पर परमौत और गिरधारी को झख मारकर उसके पीछे जाना पड़ा. कुछ देर बाद वे झिंगेड़ी के एक बंजर खेत में खड़े थे. बीबन के थैले में आटा भरा हुआ था जिससे चूने का काम लेते हुए तेज़-तेज़ उल्टा चलते हुए रायबहादुर बीबन ने खेत में बाकायदा ज़मीन के एक टुकड़े को चार तरफ से मार्क किया और रात के अंतिम प्रहर के चन्द्रमा को साक्षी बनाने की घोषणा के साथ हल्द्वानी से आये दो निर्धन लेकिन भले सन्यासियों को उसका ऑनरेरी स्वामित्व प्रदान किया.

***

सुबह के दस बजे हुए थे. बीबन को सोया छोड़कर, बचेसिंह के यहाँ चाय पी चुकने के बाद फिलहाल आधे घंटे से गिरधारी और परमौत नब्बू डीयर के साथ उसके घर के बाहर बैठे हुए थे. दोपहर बाद की पाली से छुट्टी लेकर गाँव आ जाने और उन्हें आसपास के इलाके का भ्रमण करवाने का वादा कर बचेसिंह बागेश्वर चला गया था. नब्बू थोड़ा कम बीमार लगा रहा था और उस का चेहरा पिछली शाम से थोड़ा सा भर गया सा दिख रहा था. इतनी लम्बी अनुपस्थिति के बाद अंतरंगतम मित्रमंडली की संगत उसके लिए अमृत का काम कर रही थी. 

इतने शॉर्ट नोटिस पर हल्द्वानी चल सकने में असमर्थता व्यक्त करते हुए जब वह अपने घर की विवशताओं को तीसरी बार गिना रहा था तो थालियों में रोटी सब्जी का नाश्ता लेकर बाहर आ रही उसकी माँ ने भरी आँखों से गिरधारी से कहा - "हल्द्वानी जाके जरा ठीक से इलाज हो जाएगा नबुवा का, बिस्जी! यहाँ क्या होता है! वैसाई हुआ हर दिन. जो कट गया वो कट गया समझो इष्टों की किरपा से. हमारा तो वैसे भी बुढ़ापा हुआ. के न के कर ही लेंगे. तुम ले जाओ हो इसको हल्द्वानी - सौ-पचास रुपे का जो भी खर्चा लगेगा वो मैं दे देने वाली हुई ..." वह थालियाँ लिए-लिए आँगन में ही बैठ गयी और सुबकने रोने लगी - "गरीब हुए हम लोग ... क्या कर सकने वाले हुए ... अब तुम लोग आए हुए रहे अपने दगड़ी-दोस्त के देखने को ... नहीं तो कौन आ रहा हुआ यहाँ बज्जर-पड़े झिंगेड़ी में ... ले जाओ मेरे नबुवा को अपने संग नहीं तो यहीं मर-हर जाएगा बिगैर दवाई-इलाज के ..." संकोच और ग्लानि से भर रहा नब्बू डीयर अपनी माँ को हल्का झिड़क कर भीतर जाने को कहता इसके पहले ही वह उठी, उन्हें थालियाँ थमाईं और अपने पिछले डायलॉग को दोहराते हुई घर के भीतर चली गयी - " गरीब हुए हम लोग बेटा! ... क्या कर सकने वाले हुए ..."

इस करुणा-उपजाऊ वार्तालाप ने परमौत और गिरधारी लम्बू को उतना गहरे और उस तरह प्रभावित नहीं किया जितना दूसरा कोई हो गया होता. वे जानते थे कि नब्बू डीयर का परिवार गरीब है और झिंगेड़ी-बागेश्वर में उसका सलीके का इलाज संभव नहीं. नब्बू उनका घना दोस्त था और मित्रधर्म का कर्तव्य निभाने का कोई पाठ सिखाये जाने की उन्हें कोई दरकार नहीं थी. नब्बू डीयर को हल्द्वानी ले जाया जाना था - बस! इस बात को नब्बू भी जानता था और उसे अपने दोस्तों पर गर्व था. उन्होंने चुपचाप रोटी खाना शुरू किया. सामने से अपना भावहीन चेहरा लिए नंगे पाँव, सीधा कब्र से उठकर आ रहा लगता, अपने विचारों में अलोप बीबन आता दिखाई दिया - उसके बाल उड़े हुए थे और उसकी अस्तव्यस्त वेशभूषा समेत उसके मुंह और हाथों पर पर जहां-तहां पिछली रात का आटा शोभायमान था.

(जारी)